Where do we find the core of life's meaning? Right on the job! At whatever work we do - with head or hand, from kitchen to executive suite, from your house to the White House! "Work is the great equalizer - everyone has to come to it in order to find meaning in living: no short cuts, no detours, no bargain rates."
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24 October, 2023
यतो धर्मस्ततो जयः
31 May, 2023
निर्जला एकादशी
गंगा दशहरा: पवित्र नदी गंगा का उत्सव
17 May, 2022
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
यह तब की बात है जब हनुमान जी छोटे थे। रामायण के अनुसार हनुमान जी का एक नाम बजरंग बली भी है। यह नाम उनके पिता केसरी ने रखा था। जब हनुमान जी छोटे थे तो वह बेहद नटखट थे। एक बार उन्होंने खेल - खेल में सूर्य भगवान को अपने मुंह में ले लिया था। जिसकी वजह से चारों और अंधेरा छा गया था। जब इस बात की खबर स्वर्ग देवराज इंद्र को पता लगी तो वह बेहद गुस्सा हुए। और गुस्से में आकर उन्होंने अपने वज्र से हनुमान जी की ठोढ़ी पर प्रहार किया जिसके चलते वह टुट गई। ठोढ़ी को वैसे संस्कृत में हनु भी कहा जाता है। इस घटना के बाद से ही राम भक्त बजरंगबली का नाम हनुमान रखा गया था।
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27 September, 2021
जीवित्पुत्रिका व्रत
हिंदू धर्म में कई त्योहार बेहद धूमधाम से मनाए जाते हैं, इन्हीं त्योहारों में से एक है जिउतिया पर्व। पंचांग के मुताबिक प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत किया जाता है। हर साल सुहागन स्त्रियां ये व्रत रखती हैं और संतान के हित की प्रार्थना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जितिया व्रत करने से संतान की लंबी उम्र होती है। इस व्रत को जीवित्पुत्रिका और जितिया व्रत भी कहते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार:
– इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। कहते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्री कृष्ण व्रती स्त्रियों की संतानों की रक्षा करते हैं।
– धार्मिक कथाओं के मुताबिक बताया जाता है कि एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं, दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया।
लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसके दाह संस्कार में सियारिन को भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।
अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और सियारन, छोटी बहन के रूप में जन्मीं। चील का नाम शीलवती रखा गया, शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। जबकि सियारिन का नाम कपुरावती रखा गया और उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई।
भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए और वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी, उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए।
उन्हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया। यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सिर बनाए और सभी के सिरों को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई।
सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए, जो कटे सिर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी, जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था, भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई, जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया।
– गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली, जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है, वंश की रक्षा करने के लिए वंश ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है। नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है और उन्होंने ऐसा ही किया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला। जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है, तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया। जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को ना खाने का भी वचन दिया।
03 August, 2021
सूर्य पुत्र कर्ण की सम्पूर्ण कथा
02 April, 2021
आदत क्या है?
आदत को अंग्रेजी में ‘Habit’ कहते हैं। यह लैटिन भाषा के Habitus / Habere शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है ‘प्राप्त करना’
जब व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से जान-बूझ कर बार-बार करता है। तब वह क्रिया कुछ समय बाद बिना प्रयास के अपने आप होने लगती है। इसी बार-बार दोहराये गये ऐच्छिक कार्यों के परिणाम को आदत कहते हैं।
अतः हम कह सकते हैं कि आदत एक प्रकार का अर्जित व्यवहार है जिसमे किसी क्रिया के करने का ढंग (तरीका) निहित होता है।
जैसे: खाना-पीना, उठना-बैठना, आदि एक विशेष आदत के अनुसार ही होते हैं।
आदतें एक दिन में नहीं बनतीं, इन्हें बनाने में कई दिनों का वक्त लगता है लेकिन एक बार अगर किसी चीज की आदत लग जाए तो इसे खत्म करना बहुत मुश्किल होता है। आदतें हमारी जिंदगी का हिस्सा होती हैं। कई बार आदतों के जरिए इंसान की पहचान भी होती है। हर इंसान की अलग-अलग आदतें होती हैं जो कि अच्छी-बुरी दोनों हो सकती हैं।
क्या आदतों को बदला जा सकता है? आखिर परिवर्तन ही संसार का नियम है! तो क्या हम खुद को बदलने में सफल हो पाएंगे? सोचिए।






