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24 October, 2023

यतो धर्मस्ततो जयः

यतो धर्मस्ततो जयः संस्कृत का एक श्लोक है जिसे महाभारत में कुल ग्यारह बार बोला गया है। जब अर्जुन अपने सामने अपने बंधुओं को देखकर निष्क्रिय हो गया था और अपने शस्त्र उठाने में संकोच कर रहा था तो उस समय श्रीकृष्ण ने यह श्लोक कहा और अर्जुन को समझाया कि "जहां धर्म है वहीं जीत है।"


"Victory is ensured for the side standing with Dharma, where Krishna is, there is victory."
"विजय सदा धर्म के पक्ष में रहती है, और जहां श्रीकृष्ण हैं, वहां धर्म है।"

यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य है।

31 May, 2023

निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी का व्रत अन्य सभी एकादशी के व्रतों से कठिन और विशेष है। हिंदू धर्म के अंतर्गत यह व्रत बहुत ही अधिक पवित्र माना जाता है। इस व्रत की महत्वता बहुत ही अधिक है। यहां तक की विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में भी इस व्रत के महत्व का उल्लेख किया गया है ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत रखता है उसे सभी एकादशी का फल प्राप्त होता है।
इस व्रत के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है इस व्रत को जो भी व्यक्ति पूर्ण आस्था व श्रद्धा के साथ रखता है उसके जीवन में किसी भी वस्तु की कमी नहीं होती और वह मरणोपरांत स्वर्ग में वास करता है।

निर्जला एकादशी व्रत की कथा

प्राचीन कथा के अनुसार, भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भाई युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सभी एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, पर महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई, मैं भगवान की शक्ति आदि की पूजा कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ, पर बिना भोजन किये। बिना नहीं रह सकता। इस पर व्यास जी भीम से कहते हैं कि हे भीम सेन यदि आप स्वर्ग को अच्छा और नर्क को बुरा मानते हैं तो आपको प्रत्येक महीने में आने वाली दोनों एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए।

भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं भूख नहीं सह सकता। यदि वर्ष में एक ही व्रत हो तो मैं रख सकता हूं, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम की अग्नि है, इसलिए मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूर्ण उपवास तो दूर, एक समय भी भोजन के बिना रहना मुश्किल है।

अतः आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताएं जिसे वर्ष में एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने अनेक शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े से प्रयास से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। और इसीलिए शास्त्रों के अनुसार दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है और यह व्रत मुक्ति के लिए किया जाता है।

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक जाने के नाम से डर गए और काँपते हुए कहने लगे कि अब क्या किया जाए? मैं एक मास में दो व्रत तो नहीं कर सकता, परन्तु वर्ष में एक व्रत अवश्य कर सकता हूं। अतः यदि वर्ष में एक दिन के व्रत से मुझे मुक्ति मिल सकती है, तो कोई ऐसा व्रत बताओ। यह सुनकर व्यासजी ने कहा कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जो वृष और मिथुन राशि की संक्रांति के बीच आती है, निर्जला कहलाती है। तुम उस एकादशी का व्रत करो।

इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के अलावा जल वर्जित है। आचमन में छह महीने से ज्यादा पानी नहीं रखना चाहिए, नहीं तो वह शराब जैसा हो जाता है। इस दिन अन्न नहीं खाना चाहिए, क्योंकि अन्न खाने से व्रत का नाश होता है। यदि कोई एकादशी के दिन सूर्योदय से लेकर द्वादशी के दिन सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं करता है तो उसे सभी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों को दान आदि करना चाहिए। इसके बाद किसी भूखे और योग्य ब्राह्मण को भोजन कराकर पुनः भोजन करना चाहिए। इसका फल एक वर्ष की संपूर्ण एकादशी के बराबर होता है।

व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! भगवान ने खुद मुझे यह बताया है। इस एकादशी का पुण्य सभी तीर्थों और दानों से बढ़कर है। केवल एक दिन निर्जल रहने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसकी मृत्यु के समय यमदूत आकर उसे घेरते नहीं हैं, अपितु भगवान के पार्षद उसे पुष्प विमान में बिठाकर स्वर्ग ले जाते हैं।

इसलिए निर्जला एकादशी का व्रत करना संसार में सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए इस व्रत को पुरुषार्थ से करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना चाहिए और गौदान करना चाहिए। इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने यह व्रत किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत को सच्चे दिल से रखने से सभी कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


गंगा दशहरा: पवित्र नदी गंगा का उत्सव

गंगा दशहरा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो पवित्र नदी गंगा, जिसे माँ गंगा के रूप में भी जाना जाता है, के पृथ्वी पर अवतरण के शुभ अवसर का दिन माना जाता है।

यह मानवता और पवित्र नदी के बीच बंधन को आनन्दित करने, प्रतिबिंबित करने और फिर से जगाने का समय है जो अनगिनत पीढ़ियों के लिए जीवन, प्रेरणा और मोक्ष का स्रोत रहा है।





17 May, 2022

बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?

यह तब की बात है जब हनुमान जी छोटे थे। रामायण के अनुसार हनुमान जी का एक नाम बजरंग बली भी है। यह नाम उनके पिता केसरी ने रखा था। जब हनुमान जी छोटे थे तो वह बेहद नटखट थे। एक बार उन्होंने खेल - खेल में सूर्य भगवान को अपने मुंह में ले लिया था। जिसकी वजह से चारों और अंधेरा छा गया था। जब इस बात की खबर स्वर्ग देवराज इंद्र को पता लगी तो वह बेहद गुस्सा हुए। और गुस्से में आकर उन्होंने अपने वज्र से हनुमान जी की ठोढ़ी पर प्रहार किया जिसके चलते वह टुट गई। ठोढ़ी को वैसे संस्कृत में हनु भी कहा जाता है। इस घटना के बाद से ही राम भक्त बजरंगबली का नाम हनुमान रखा गया था।




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27 September, 2021

जीवित्पुत्रिका व्रत


हिंदू धर्म में कई त्योहार बेहद धूमधाम से मनाए जाते हैं, इन्हीं त्योहारों में से एक है जिउतिया पर्व। पंचांग के मुताबिक प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत किया जाता है। हर साल सुहागन स्त्रियां ये व्रत रखती हैं और संतान के हित की प्रार्थना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जितिया व्रत करने से संतान की लंबी उम्र होती है। इस व्रत को जीवित्पुत्रिका और जितिया व्रत भी कहते हैं।


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार:


– इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। कहते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्री कृष्ण व्रती स्त्रियों की संतानों की रक्षा करते हैं।


धार्मिक कथाओं के मुताबिक बताया जाता है कि एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं, दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया।


लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसके दाह संस्कार में सियारिन को भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।


अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और सिया‍रन, छोटी बहन के रूप में जन्‍मीं। चील का नाम शीलवती रखा गया, शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। जबकि सियारिन का नाम कपुरावती रखा गया और उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई।


भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए और वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्‍हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी, उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए।


उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया। यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सिर बनाए और सभी के सिरों को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई।


सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए, जो कटे सिर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी, जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था, भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई, जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया।


गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली, जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है, वंश की रक्षा करने के लिए वंश ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है। नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है और उन्होंने ऐसा ही किया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला। जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है, तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया। जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को ना खाने का भी वचन दिया।






03 August, 2021

सूर्य पुत्र कर्ण की सम्पूर्ण कथा

सूर्यपुत्र कर्ण, महारथी कर्ण, दानवीर कर्ण, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कर्ण, राधेय, वसुषेण ऐसे कितने ही नामों से पुकारा जाने वाले इस महान यौद्धा के महाभारत के युग में जन्म के साथ ही दुर्भाग्य ने अन्त तक उसका पीछा नहीं छोड़ा। नियती कदम कदम पर उसके साथ क्रूर खेल खेलती रही। जिस कारण धर्म के पक्ष में खड़े होने वाले इस महारथी को धर्म विरुद्ध युद्ध लड़ने के लिए विवश होना पड़ा। नियती ने कदम कदम पर उसे उस अपराध का दण्ड दिया जो उसने किया ही नहीं था जिसमें उसका कोई कसूर नहीं था। शायद महाभारत का कोई सबसे वीर, शक्तिशाली तथा कारुणिक पात्र यही है।

 

 
 महाभारत की कुछ व्याख्यायों के अनुसार, यही वह कृत्य था जिसने भली प्रकार से ये प्रमाणित कर दिया की कर्ण युद्ध में अधर्म के पक्ष में लड़ रहा है और इस कृत्य के कारण उसके इस दुर्भाग्य का भी निर्धारण हो गया की वह भी अर्जुन द्वारा इसी प्रकार मारा जाएगा जब वह शस्त्रास्त्र हीन और रथहीन हो और उसकी पीठ अर्जुन की ओर हो। कर्ण के पास सत्रहवें दिन के युद्ध में अर्जुन का वध करने का पूरा अवसर था लेकिन युद्ध नियमों का पालन करते हुए उसने अर्जुन पर बाण नहीं चलाया क्योंकि तब तक सूर्यदेव अस्त हो चुके थे।
 

 
 
 
 
 
 
 

02 April, 2021

आदत क्या है?

आदत को अंग्रेजी में ‘Habit’ कहते हैं। यह लैटिन भाषा के Habitus / Habere शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है ‘प्राप्त करना’

जब व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से जान-बूझ कर बार-बार करता है। तब वह क्रिया कुछ समय बाद बिना प्रयास के अपने आप होने लगती है। इसी बार-बार दोहराये गये ऐच्छिक कार्यों के परिणाम को आदत कहते हैं।

अतः हम कह सकते हैं कि आदत एक प्रकार का अर्जित व्यवहार है जिसमे किसी क्रिया के करने का ढंग (तरीका) निहित होता है।

जैसे: खाना-पीना, उठना-बैठना, आदि एक विशेष आदत के अनुसार ही होते हैं।

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आदतें एक दिन में नहीं बनतीं, इन्हें बनाने में कई दिनों का वक्त लगता है लेकिन एक बार अगर किसी चीज की आदत लग जाए तो इसे खत्म करना बहुत मुश्किल होता है। आदतें हमारी जिंदगी का हिस्सा होती हैं। कई बार आदतों के जरिए इंसान की पहचान भी होती है। हर इंसान की अलग-अलग आदतें होती हैं जो कि अच्छी-बुरी दोनों हो सकती हैं।
 

क्या आदतों को बदला जा सकता है? आखिर परिवर्तन ही संसार का नियम है! तो क्या हम खुद को बदलने में सफल हो पाएंगे? सोचिए।